सोमवार, जनवरी 24, 2005

ईश्वर क्या है और उसका क्या स्वभाव है?

गीता में श्री भगवान या ईश्वर शब्द बार-बार आया है । इस भगवान शब्द का अर्थ है--

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रिय ।
ज्ञान वैराग्योस्चैव पण्णां भग इतीरणा ॥


अर्थात् सम्पूर्ण बल, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, इन छः का नाम भग या विभूति है । यह सब विभूतियां जिसमें सम्पूर्ण हों, वही भगवान है । इन छहों में बल के अन्तर्गत आत्मबल, तपोबल, बाहुबल आदि समस्त बलों का समावेश है । धर्म में समस्त कुल, आश्रम, जाति, देश, राज्य, नीति और जीव के कर्त्तव्य कर्मादि सम्मिलित है । यश में सभी प्रकार के यश है । श्री में सभी सम्पदा, धन, अन्न, द्रव्य, पशु और भूमि इत्यादि है । ज्ञान के अन्तर्गत सभी प्रकार के ज्ञान, विज्ञान, शास्त्र, कला और आविष्कार आदि है । जगत के यावत विषयों में रहते हुए उनमें लिप्त न होते हुये भोगने का अर्थ वैराग्य है ।

उपर्युक्त विवेचन से ज्ञात होता है कि इन सबको ईश्वर ही हस्तगत कर सकता है । परन्तु अंश के रूप में मनुष्य इसके किसी एक विभाग या विषय में भी सिद्धि प्राप्त कर लें तो उसी अंश रूप के अनुपात में, अन्य शेष पाँच विभूतियाँ भी उसको स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, यह एक विचित्रता है ।

ईश्वर का स्वभाव ये है कि वो जो भी कहता है वो हो जाता है । इसलिए अगर हम अपने को अच्छा कहेगें तो, अच्छे हो जायेगें, अगर अपने को अमीर कहेगें तो अमीर हो जायेगें । समुद्र के एक बूँद पानी का विश्लेषण करें अथवा पूरे समुद्र के पानी का, उनमें समानता स्वाभाविक है । इसलिए चाहे आप छोटे हों या बड़ें, आप में और सबमें कोई अन्तर नहीं है ।

[ जीने की कला नामक लेख का एक अंश ]