शुक्रवार, जनवरी 28, 2005

"तनाव" भी जरूरी है जीने के लिए !

आप भी सोच रहे होगें कि यह क्या उलट बात हुई । आज जब अधिकतर चर्चा होती है कि कैसे तनाव-मुक्त रहा जाएँ तो मै कैसी उलट बात कर रहा हूँ ।

यदि तनाव नहीं है तो जीवन भी नहीं है । जैसा कि बहुधा हम कई बार बोलत्ते है कि "मुझे तो ब्लड-प्रेशर की शिकायत है ।" लो भला बोलो, यदि ब्लड में प्रेशर ही नहीं होगा तो क्या जीना संभव होगा । मानव-मन/मष्तिक भी एक मशीन/कम्प्यूटर की भांति है । जब इसमें किसी एक विचार को बार-बार चलाया जाता है तो भले वह सत्य ना भी हो, तो भी यह उसे सत्य मानने लगता है और यदि उस विचार के साथ डराने वाली/नकारात्मक परिणामों की ही जानकारी या अपेक्षायें जुड़ी हुई हो तो मष्तिक उसके समाधान को ढ़ूढ़ने में जुट जाता है । अब यह स्थिति वैसी ही हो जाती है कि बुखार तो है नहीं पर दवा खायें जा रहे है । क्या जब हम यह बार-बार कहते है कि मुझे ब्लड-प्रेशर है या मुझे तनाव है, तो क्या वास्तव में हम चाहते है कि हमारे ब्लड में प्रेशर ही ना रहे या शरीर से तनाव गायब हो जायें । ऐसा नहीं है । परन्तु आज चारों तरफ़ चर्चा इस बात की अधिक होती है कि इस बात से हानि क्या होगी । लाभ क्या होगा यह बहुत अल्प रूप में बताया जा रहा है ।

भाषा और बोलने की क्षमता, जो कि आज मनुष्य के अन्दर पायी जाती है, उसे चाहे धर्म की दृष्टि से मंत्र शक्ति मानें या विज्ञान के दृष्टि से एक रसायनिक प्रक्रिया, परन्तु हम स्वंय के लिए उसके सर्जन-कर्ता व नियंत्रक स्वंय ही है। इसलिए, सभी विचारों व क्रियाओं के दोनों सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं को जानना आवश्यक है ।

वापस तनाव की ओर। आजकल चारों तरफ़ तनाव नामक शब्द की बहुत चर्चा होती है तथा इसे सामान्य तौर पर विपरीत व जीवन-नाशक समझा जाता है । जबकि वास्तविकता इसके उलट है । वास्तव में "तनाव" क्या है ?

तनाव, उत्तेजना का वह स्तर है जहाँ घटनायें और उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता से बाहर हो जाते है ।

जब इसी तनाव का, हम नकारत्मक उपयोग करते है तो यह हमारी क्षमताओं को उनके न्यूतम-स्तर तक ले जाता है और हम अपने को पंगु महसुस करते है ।

जब इसी तनाव का हम सकारात्मक उपयोग करते है तो यह हमारी क्षमताओं को असीमित बनाता है और हमसे उन कार्यों तक को करता है जो कि उससे पूर्व असम्भव माने जाते थे ।

अब यह हमारे हाथ में है कि हम या तो अपनी क्षमता बढ़ायें या फ़िर घटनाओं को निर्वाकार रूप से होते हुए देखें । इस तनाव को नियंत्रित करते हुए जीना ही जीने की कला है, जिससे कि न सिर्फ़ हम अपनी क्षमताओं को बढ़ाते है, बल्कि अपना कल्याण करते हुए, इस समस्त जगत के कल्याण में भी अपना योगदान दे पाते है ।

इस विचार पर आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा रहेगी ।

धन्यवाद ।