सोमवार, मई 30, 2005

मेरा परिचय

मेरा परिचय यानी कि "मै कौन हूँ?"

बहुत ही जटिल प्रश्न है, जिसका उत्तर पाने के लिए बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी लगे रहते है । "मै कौन हूँ?" में तीन शब्द है । प्रथम है "मै" । अब आज़ तक यही सुना व पढ़ा कि इस "मै" को हटाओ तभी अपने वास्तविक रूप को जान पाओगे अर्थात मै "मै" तो नहीं हो सकता । अब बचा "कौन हूँ?" अब यह "कौन" तो क्षण-प्रति-क्षण' बदलता रहता है ? कभी मै पिता हो जाता हूँ, तो कभी पति । कभी मै "दल-नायक" तो कभी "दल का एक सदस्य । कभी एक चिठ्ठाकार हो जाता हूँ, तो कभी एक चिठ्ठा पाठक । इसलिए, किसी एक क्षण के लिए,यह बताना कठिन है कि "कौन हूँ?" अब बचा "हूँ?" अब यह "हूँ" भी अज़ब है क्योंकि जो मै कल था, वह आज़ नहीं हूँ, जो आज़ हूँ, वो कल नहीं रहूगा । इसलिए कभी-कभी लगता है कि वास्तव में, मै "हूँ" भी कि नहीं ।

पर जो भी हो, यह कार्य करना तो है क्योंकि हम सभी के प्रिय जीतू भाई ने "अपना परिचय" भेजने के लिए बहुत पूर्व आग्रह किया था । यह कार्य तो बायो-डाटा बनाने से भी किलष्ट प्रतीत होता है क्योंकि अपनी इस जीवन की अभी तक की समस्त यात्रा को चंद शब्दों में समेट कर लिखना भी "गागर में सागर" भरने के समान है । जीतू-भाई के आग्रह को शिरोधार्य करते हुए, अपना परिचय लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, आशा करता हूँ कि आपको यह रोचक व पढ़ने-योग्य लगेगा । हमेशा की भांति, आपके सूझावों का स्वागत रहेगा, जो कि ना सिर्फ़ मेरी भाषा व वर्तनी के दोषों को दूर करेगें बल्कि मेरे जीवन को भी और अधिक दोष-मुक्त करने में सहायक होगें ।

मेरे इस जीवन की यात्रा का आरम्भ वर्ष १९६२, माह जनवरी में "नवाबों की नगरी" लखनऊ, उत्तर-प्रदेश, भारत में हुआ । आठवीं तक की शिक्षा "कपड़ा मजदूरों की कर्म-भूमि" कानपूर में, ९वी से लेकर १२वी तक की शिक्षा, "ब्रज-भूमि" हाथरस में और विज्ञान में स्नातक की उपाधि "भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की विद्या-पीठ" डी०ऐ०वी० कालेज, कानपुर से प्राप्त की । एम०एस०सी० (भौतिक-विज्ञान) की शिक्षा के दौरान, वर्ष १९८२ में कम्प्यूटर के कीड़े ने ऐसा काटा कि एम०एस०सी० को बीच में छोड़ कर सी०एम०सी०, दिल्ली से साफ़्टवेयर के कोर्स करके, कानपुर में अपने कम्प्यूटर की कैरियर की शुरूवात की । बाद में बड़ोदा, गुजरात से, इनवेन्टरी-प्रबंधन व स्टोर-प्रबंधन में डिप्लोमा भी किया । "करत-करत अभ्यास के, जड़वत होत सुजान" नामक कथन को सत्य मानते हुए, अनेकों आपरेटिंग-सिस्टमों, डाटाबेसों, आफ़िस-आटोमेशन कार्यक्रमों, प्रोग्रामिंग भाषाओं को जानने-समझने का प्रयास किया पर अंत में प्यार हुआ "डाटाबेस-प्रबंधन व सामग्री-प्रबंधन" से । तब से इन दो की मदद लेते हुए, रोजी-रोटी की तलाश में, टैनरी, खाद-कारखाना, कृत्रिम अंग निर्माण कारखाना, खान, कैमिकल प्लांट, कम्प्यूटर परामर्श प्रतिष्ठानों, पैट्रो-रसायन कारखानों व रिफ़ानरी की यात्रा की है ।

वर्तमान में, भारत के अग्रणी व्यापारिक प्रतिष्ठान रिलायन्स समूह की ई०पी०सी० ( इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेन्ट कन्सट्रक्सन) इकाई, रिलायंस इन्जीनियरिंग ऐसोसियेट प्रा० लिमिटेड, ज़ामनगर में, वरिष्ट-प्रबंधक(सिस्टम) के रुप में कार्यरत हूँ ।

शुरू से, त्रिकोण के चौथे कोण को देखने, जानने व समझने का प्रयास रहा । चाहे इसे आप मेरी मानव-प्रकृति कहे या एक "Aqurius" की इस संसार को एक अलग नजरिये से समझने की चेष्टा या फ़िर सप्त-ग्रह योग में जन्में हुए व्यक्ति की एक स्वाभाविक प्रवृति ।

पत्नी गीता, जिनका दीदार विवाह-पूर्व नहीं किया था, परन्तु विवाह-उपरान्त निरंतर दिन-प्रति-दिन करता रहता हूँ । एक पुत्री रूपाश्री व एक पुत्र ऐश्वर्य के जन्म-स्वरूप, पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । "यत्र नारी पूजन्यते, तत्र देवता बसन्ते" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है नामक कथन को शिरोधार्य करते हुए, विवाह-पूर्व मातृ-भक्ति में और विवाह-उपरांत पत्नी-भक्ति में जीवन व्यतीत हो रहा है ।

देश व मातृ-भाषा हिन्दी से प्रेम के कारण, जीवन के आरम्भ से, जब से हिन्दी में पढ़ना आया, जो कुछ भी सामने आया, उसे पढ़ डाला । मुझे आज भी याद आता है, बेसिक लैग्वेज़ में एक अपना प्रोग्राम, जिसेमें मैने स्टार चिन्ह्न का उपयोग करके सिर्फ़ अपना नाम लिखा था । बाद में, इसी शैली का उपयोग करके, मेरे उस समय के प्रतिष्ठान के लिए, बहुत सारे विभागों व अन्य नोटिस-बोर्डो की विषय-वस्तुओं को हिन्दी में लिख कर देना पड़ा । वैसा ही आनन्द में, उस समय भी आया, जब मैने श्री आलोक कुमार जी के याहू-विपत्र-समूह में शामिल होने के लिए, अपनी याहू-प्रोफ़ाइल में अपना नाम हिन्दी में लिखा ।

उस दौर से लेकर आज तक ई-हिन्दी का सफ़र हमेशा मेरी सामने एक किताब जैसा खुला रहता है । ई-हिन्दी, यूनिकोड तकनीकी व लिनक्स के समन्वय के उपलब्ध हो जाने के उपरान्त, विगत ३-४ वर्षों से, हिन्दीकरण में अपना सक्रिय योगदान देने में समर्थ हो पा रहा हूँ ।

आज आप सभी चिठ्ठाकारों की रचनाओं को पढ़ते हुए, ई०-हिन्दी को एक नये आयाम में जाते हुए देख रहा हूँ । और अब लगता है कि जिस हिन्दी की दुर्दशा की जिक्र श्री अतुल श्रीवास्तव जी ने अपने चिठ्ठे लखनवी।ब्लागस्पाट।कॉम में किया है और जो हिन्दी चंद सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों के अन्दर, सस्ती व फ़ूहड़ उपन्यासों व किताबों में, सिमटते हुए कवि-सम्मेलनों व मुशायरों में और बिना-सर-पैर के गानों में सिमट कर रह गयी थी, वो अब ई०हिन्दी के माध्यम से, अब पुरानी दयनीय काया को छोड़ कर, एक नये रूप में जन्म ले रही है और अब देरी नहीं है, जब यह एक बार फ़िर से ना सिर्फ़ भारत की, बल्कि समस्त विश्व के जन-जन की भाषा बन जायेगी ।

आपका

धनञ्जय शर्मा
जामनगर, भारत से ।
३०।५।२००५