रविवार, जून 26, 2005

"तो तुम आये थे" के आगे

सुश्री प्रत्यक्षा जी अपने चिठ्ठे में एक बहुत ही सुन्दर लघु-कविता लिखी है ।

रात भर ये मोगरे की खुशबु कैसी थी
अच्छा ! तो तुम आये थे नीदों में मेरे ?


इतने कम शब्दों में इस मानवीय भाव को हिन्दी कविता के द्वारा प्रत्यक्षा जी ने बहुत सशक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है ।

उसी भाव को आगे बढ़ाने के दिशा में मेरा यह प्रयास है । अपने विवाह-पूर्व दिनों को याद करते हुए, अपनी पत्नी गीता को यह कविता समर्पित कर रहा हूँ । आशा करता हूँ कि यह कविता आपको भी पसन्द आयेगी ।

होता रहा रात भर, एक रेश्मी छुअन का अहसास ।
अच्छा ! तो तुम आये थे नीदों में मेरे पास ?

जागने के बाद भी, होते रहे मीठे मेरे जज़बात ।
अच्छा ! तो तुम आये थे सपनों में मेरे, कल रात ?

अब तो मुश्किल है दिन का गुजारना, और इन्तज़ार है, कि कब होए रात ।
हो सकता है कि सपना कभी हकीकत बन जायें, और रहो तुम हमेशा मेरे पास, हर दिन और हर रात ॥

- धनञ्जय शर्मा
२६।६।२००५

शनिवार, जून 11, 2005

कविता प्रति-कविता

श्री कालीचरण जी ने अपने भात-भाजी चिठ्ठे में शुभ-प्रभात पर एक छोटी परन्तु बहुत ही मनमोहक कविता लिखी है । चूंकि, बिना मूल कविता को उल्लेखित किये हुए, इसकी प्रति-कविता अपना भावार्थ नहीं दे पायेगी, अतैव बिना उनसे अनुमति लिये हुए, मूल कविता का यहाँ उल्लेख कर रहा है । आशा करता हूँ कि यह चिठ्ठाकारी के मूल नियमों के तहत मान्य है ।

श्री कालीचरण जी ने लिखा :

"सुबह उठा तो यह पाया
िप्रतम हाथो मे हाथ धरे बोली
आपकी सान्सो मे मेरी सान्से रमी है
अब उठो भी, एक कप चाय की कमी है ।"


इसे पढ़ कर, जो भाव में मन में आया, उसे इस प्रति-कविता के द्वारा प्रस्तुत कर रहा हूँ:-

"सुन कर उनकी बात,
लिया मैने अपने हाथो में उनका हाथ, और कहा,
चाय तो में बना लाउँगा, प्रिये,
पर, चाह तो अभी भी बनी हुई है । "

रविवार, जून 05, 2005

एक कविता का अनुवाद

श्री जयमिन पटेल द्वारा ई-मेल में प्राप्त एक अनुरोध के फ़लस्वरूप, पहली बार किसी एक कविता के हिन्दी अनुवाद का अवसर मिला । आप सभी के समक्ष इस अनुवाद को प्रस्तुत कर रहा हूँ । आशा करता हूँ कि हिन्दी अनुवाद में कविता का मूल भाव प्रकट हो रहा है ।

गुलाब होते है लाल,
बनफ़शे होते है बैगनी ।
अपनी पहचान को बदल सकता हूँ मै कभी भी
तुम्हें प्यार करते रहने को बदल सकता हूँ, कभी नहीं ॥


"Roses are red
Violets are Blue
I can change my culture
But i can never change loving you."


दिनांक १२।६।२००५ को जोड़ा :
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एक बार फ़िर, श्रीमती जी ने फ़िर सिद्ध कर दिया कि वे "श्री" + "मति" दोनों की स्वामिनी है और यदि अंग्रेजी में कहा जाएँ तो "Better Half" । उन्होनें इसी कविता का अपनी काव्यात्मक शैली और अपने परा-स्नातक हिन्दी ज्ञान का उपयोग करके इस प्रकार किया :

लाल होते है गुलाब, नीले बनफ़ूल ।
खुद को बदल सकता हूँ, पर
तुम्हें ना-चाहने की, कर नहीं सकता हूँ भूल ॥

शनिवार, जून 04, 2005

ट्रकों के पीछे लिखे जीवन के मूल्य

हाई-वे पर यात्रा करने के दौरान, मै हमेशा आगे चलने वाले ट्रकों के पीछे लिखी हुई, उक्तियों/शेरो-शायरियों को पढ़ता रहता हूँ । जीवन के मूल्यों पर दो-लाइनों में, इससे अधिक किसी भी जगह पर, यह ज्ञान शायद ही उपलब्ध होगा । हाल ही, मै अपने निवास-स्थल से जामनगर की यात्रा कर रहा था । आगे जाने वाले ट्रक के पीछे लिखा था :

"मेरा सो जावे नहीं, जावे सो मेरा नहीं ।"

मुझे लगता है, मात्र सिर्फ़ इस विचार को ही आत्मसात करने से, और किसी तनाव-मुक्त करने की प्रक्रिया या उपचार की आवश्यकता नहीं होगी ।

गुरुवार, जून 02, 2005

मैनड्रिवा या मैनड्रीवा ?

हाल ही में, मैनड्रैकसॉफ़्ट ने कनेक्टीवा नामक कम्पनी के साथ साझापन समझौता किया है, जिसके परिणाम-स्वरूप, इन दोनों ने आपस में एकाकार होने का निर्णय लिया । इस विलय के कारण, मैनड्रैकलिनक्स को भी एक नया नाम मिल गया । यह नया नाम Mandriva Linux है ।

अब इसे हिन्दी में मैनड्रिवा, या फ़िर मैनड्रीवा लिखा जाएँ ?

आप सभी के मार्गदर्शन की प्रतिक्षा रहेगी ।

धन्यवाद ।

धनञ्जय शर्मा