शनिवार, जून 11, 2005

कविता प्रति-कविता

श्री कालीचरण जी ने अपने भात-भाजी चिठ्ठे में शुभ-प्रभात पर एक छोटी परन्तु बहुत ही मनमोहक कविता लिखी है । चूंकि, बिना मूल कविता को उल्लेखित किये हुए, इसकी प्रति-कविता अपना भावार्थ नहीं दे पायेगी, अतैव बिना उनसे अनुमति लिये हुए, मूल कविता का यहाँ उल्लेख कर रहा है । आशा करता हूँ कि यह चिठ्ठाकारी के मूल नियमों के तहत मान्य है ।

श्री कालीचरण जी ने लिखा :

"सुबह उठा तो यह पाया
िप्रतम हाथो मे हाथ धरे बोली
आपकी सान्सो मे मेरी सान्से रमी है
अब उठो भी, एक कप चाय की कमी है ।"


इसे पढ़ कर, जो भाव में मन में आया, उसे इस प्रति-कविता के द्वारा प्रस्तुत कर रहा हूँ:-

"सुन कर उनकी बात,
लिया मैने अपने हाथो में उनका हाथ, और कहा,
चाय तो में बना लाउँगा, प्रिये,
पर, चाह तो अभी भी बनी हुई है । "