कविता प्रति-कविता
श्री कालीचरण जी ने लिखा :
"सुबह उठा तो यह पाया
िप्रतम हाथो मे हाथ धरे बोली
आपकी सान्सो मे मेरी सान्से रमी है
अब उठो भी, एक कप चाय की कमी है ।"
इसे पढ़ कर, जो भाव में मन में आया, उसे इस प्रति-कविता के द्वारा प्रस्तुत कर रहा हूँ:-
"सुन कर उनकी बात,
लिया मैने अपने हाथो में उनका हाथ, और कहा,
चाय तो में बना लाउँगा, प्रिये,
पर, चाह तो अभी भी बनी हुई है । "


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