tag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1119783572715244922005-06-26T03:06:00.000-07:002005-06-26T07:03:09.140-07:00"तो तुम आये थे" के आगेसुश्री प्रत्यक्षा जी अपने चिठ्ठे में एक बहुत ही सुन्दर लघु-कविता लिखी है । <br /><br /><a href="http://pratyaksha.blogspot.com/2005/06/blog-post_22.html">रात भर ये मोगरे की खुशबु कैसी थी<br />अच्छा ! तो तुम आये थे नीदों में मेरे ? </a><br /><br />इतने कम शब्दों में इस मानवीय भाव को हिन्दी कविता के द्वारा प्रत्यक्षा जी ने बहुत सशक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है । <br /><br />उसी भाव को आगे बढ़ाने के दिशा में मेरा यह प्रयास है । अपने विवाह-पूर्व दिनों को याद करते हुए, अपनी पत्नी गीता को यह कविता समर्पित कर रहा हूँ । आशा करता हूँ कि यह कविता आपको भी पसन्द आयेगी । <br /><br /><strong>होता रहा रात भर, एक रेश्मी छुअन का अहसास । <br />अच्छा ! तो तुम आये थे नीदों में मेरे पास ? <br /><br />जागने के बाद भी, होते रहे मीठे मेरे जज़बात । <br />अच्छा ! तो तुम आये थे सपनों में मेरे, कल रात ? <br /><br />अब तो मुश्किल है दिन का गुजारना, और इन्तज़ार है, कि कब होए रात । <br />हो सकता है कि सपना कभी हकीकत बन जायें, और रहो तुम हमेशा मेरे पास, हर दिन और हर रात ॥ </strong><br />- धनञ्जय शर्मा<br />२६।६।२००५<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9521204-111978357271524492?l=linhin.blogspot.com'/></div>Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.com